Friday, November 16, 2012

ऑफीशियल वेग-उद्वेग – एक साथी की रैट-रेस से हटकर कुछ अलग करने की कथा




पुरानी कंपनी के एक मित्र के लिखे हुए कुछ शब्‍द मिल गए ऑनलाइन, आनंद आ गया उनके वेग-उद्वेग को पढ़कर, सोचा आप लोगों को क्‍यों महरूम रखा जाए! सो मित्र के अंग्रेजी में लिखे गए शब्‍दों को हिंदी में प्रस्‍तुत कर रहा हूं।

बात कुछ दो-तीन वर्ष पहले की है, हम दो अलग डिपार्टमेंट में काम किया करते थे। वो लोकलाइजेशन इंजीनियरिंग में थे और मैं प्रोजेक्‍ट मैनेजमेंट में. अक्‍सर उनके टेक्निकल स्‍किल्स की जरूरत पड़ जाती थी, उसी दौरान उनसे संपर्क मित्रता के स्‍तर तक पहुंच गया। मुझे लगता था कि उनका रिटायरमेंट इसी कंपनी से होना है. खैर, तकरीबन तीन वर्ष पहले मैंने कंपनी बदल ली और वो वहीं टिके रहे, लेकिन ये क्‍या! कल उनके शब्‍द ऑनलाइन मिले और पता चला कि एक साल पहले उन्‍होंने भी कंपनी छोड़ दी और अपनी राह बनाने निकल पड़े। उनके शब्‍द कुछ इस प्रकार थे

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बहुत हो गया
बहुत हो गए कार्पोरेट रूल्‍स। ये इस तरह करो, वो उस तरह करो; चूंकि ऐसा ही कहीं भी करना होता है। काफी हो गये कंपनी के हाइरार्की और संस्कृति के बंधन। काफी हो गये तथाकथित सर्वोत्‍तम परिपाटी (Best Practices), मूल्‍यांकन और व्‍यवस्‍था क्रम (appraisals and processes) लगता है जैसे कि दूसरे तरीके से दास बनाया जा रहा हूं।

हे भगवान, मैं क्‍या कर रहा था? और क्‍यों मुझे कुछ पहले नहीं महसूस हुआ कि ये कार्य-संस्‍कृति मेरी प्रवीणता, निपुणता, दक्षता को अंदर ही अंदर प्रज्‍जवलित करने के  बजाय निरूत्‍साहित करनेवाली है।

सो मैंने दूसरी जगह ध्‍यान लगाया। बस समझ लीजिए सोचा कि मैं खुद को यहां से निकाल कर खुले बाजार में अपने आप को परखना चाहता था। मैं चीजों को दूसरी तरह से करना चाहता था। सामान्‍य शब्‍दों में मैं आजाद तरीके से काम कर अपनी क्षमताओं को परखना चाहता था और देखना चाहता था कि मेरी क्षमताएं मुझे कहां तक ले जा सकती हैं।

आजादी, जिसके साथ मैं कुछ काम कर सकूं। बदलाव के लिए मेरे खुद के नियम बनाने की आजादी

यदि मैं सच में अच्‍छा काम करता हूं तो अपने आकाओं की सेवा-सुश्रुषा करने और जेबें भरने एवं महीने के अंत का इंतजार करने की बजाए मैं खुद के लिए क्‍यों नहीं करता।
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और फिर उन्‍होंने ऑफिस छोड़ दिया। फिलहाल, इस दीवाली पर उनका बधाईवाला मैसेज प्राप्‍त हुआ है, पर विस्‍तार में उनसे बातचीत बाकी है। अब देखना है कि वे कितनी ऊंचाईयां छू पाए हैं। खैर एक बात तो तय है एक साल से जिस जज्‍बे के साथ कार्यरत हैं वो कुछ कम नहीं है मित्र के उस जज्‍बे को सलाम


(शेष कथा-व्‍यथा अगले ब्‍लॉग में…)

Monday, November 12, 2012

हैप्‍पी दीवाली



मेरी इस दीवाली में
कुछ पल ख़ास तुम्हारे भी हैं
मेरी इस दीवाली में 
कुछ दिये तुम्हारे भी हैं


प्रतिदिन प्रति विश्‍वास 
नयी आस मिले
कर्मभूमि में अग्रसरित होने 
का विश्‍वास मिले


कर्मभूमि के आंगन में
कुछ सुंदर फूल तुम्‍हारे भी हैं
मेरी इस दीवाली में 
कुछ दिये तुम्हारे भी हैं


दिये तुम्‍हारे हों या मेरे
अंधेरे का विनाश करें
बधाई तुम्‍हारी हो या मेरी
इस दीवाली सबको खुशहाल करे



हां तुम्‍ही हो जिसके लिए ये बधाई है…. हैप्‍पी दीवाली J

Saturday, November 3, 2012

अच्‍छी कहानी – ’’आप मेरे जैसे हों?’’


एक बार एक लड़का अपने स्कूल की फीस भरने के लिए एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे तक कुछ सामान बेचा करता था, एक दिन उसका कोई सामान नहीं बिका और उसे बड़े जोर से भूख भी लग रही थी. उसने तय किया कि अब वह जिस भी दरवाजे पर जायेगा, उससे खाना मांग लेगा. दरवाजा खटखटाते ही एक लड़की ने दरवाजा खोला, जिसे देखकर वह घबरा गया और बजाय खाने के उसने पानी का एक गिलास पानी माँगा. लड़की ने भांप लिया था कि वह भूखा है, इसलिए वह एक...... बड़ा गिलास दूध का ले आई. लड़के ने धीरे-धीरे दूध पी लिया. "कितने पैसे दूं?" लड़के ने पूछा. "पैसे किस बात के?" लड़की ने जवाव में कहा." माँ ने मुझे सिखाया है कि जब भी किसी पर दया करो तो उसके पैसे नहीं लेने चाहिए." " तो फिर मैं आपको दिल से धन्यवाद देता हूँ." जैसे ही उस लड़के ने वह घर छोड़ा, उसे न केवल शारीरिक तौर पर शक्ति मिल चुकी थी, बल्कि उसका भगवान और आदमी पर भरोसा और भी बढ़ गया था. सालों बाद वह लड़की गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी. लोकल डॉक्टर ने उसे शहर के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए भेज दिया. विशेषज्ञ डॉक्टर होवार्ड केल्ली को मरीज देखने के लिए बुलाया गया. जैसे ही उसने लड़की के कस्वे का नाम सुना, उसकी आँखों में चमक आ गयी. वह एकदम सीट से उठा और उस लड़की के कमरे में गया. उसने उस लड़की को देखा, एकदम पहचान लिया और तय कर लिया कि वह उसकी जान बचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देगा. उसकी मेहनत और लग्न रंग लायी और उस लड़की कि जान बच गयी. डॉक्टर ने अस्पताल के ऑफिस में जा कर उस लड़की के इलाज का बिल लिया.
उस बिल के कोने में एक नोट लिखा और उसे उस लड़की के पास भिजवा दिया. लड़की बिल का लिफाफा देखकर घबरा गयी, उसे मालूम था कि वह बीमारी से तो वह बच गयी है लेकिन बिल कि रकम जरूर उसकी जान ले लेगी. फिर भी उसने धीरे से बिल खोला, रकम को देखा और फिर अचानक उसकी नज़र बिल के कौने में पेन से लिखे नोट पर गयी, जहाँ लिखा था," एक गिलास दूध द्वारा इस बिल का भुगतान किया जा चुका है." नीचे डॉक्टर होवार्ड केल्ली के हस्ताक्षर थे. ख़ुशी और अचम्भे से उस लड़की के गालों पर आंसू अपक पड़े उसने ऊपर कि और दोनों हाथ उठा कर कहा," हे भगवान! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, आपका प्यार इंसानों के दिलों और हाथों द्वारा न जाने कहाँ- कहाँ फैल चुका है." और, सब ठीक हो गयाJ

Wednesday, October 17, 2012

मैंगो पीपल इन बनाना रिपब्लिक, क्‍या बात है...

गूगल में रॉबट वाड्रा खोजने से सबसे पहले आपको विकिपीडिया में उनकी प्रोफाइल दिखेगी। प्रोफाइल कुछ पर्सनल सूचना से शुरू होती है जैसे रॉबर्ट साहब प्रियंका गांधी से तब मिले थो जब वो 13 साल की थीं। आगे बढ़ने पर बात राजनीति पर आती है, सन् 2010 में उन्‍होंने टाइम्‍स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा था कि उचित समय आने पर वो राजनीति में कदम रखेंगे।

अब दो साल बाद समय तो एकदम उचित नहीं लगता पर वो एक बड़े राजनीतिक पचड़े के केंद्र में दिखते हैं। खैर, मुद्दे पर आते हैं रॉबर्ट स्‍पेशल केस, नंबर दो देश की बड़ी कंपनी डीएलएफ से उनके रिश्‍ते और उनके मायने, और नंबर तीन पक्ष-विपक्ष। कुछ ही बरसों में वाड्रा साब ने काफी प्रगति की है। अब ये सबको कैसे बर्दाश्‍त होता सो लग गए लोग पीछे, नतीजा हो-हल्‍ला एक नहीं सारी जगहों पर टीवी, अखबार, इंटरनेट, चाय की  दुकान और न जाने कहां कहां। अब सरकारी कथन है कि वो प्राइवेट इंडीवीजुअल हैं सो वो जाने उनका काम जाने। विपक्षी बोलते हैं अरे कम कीमत में सरकारी जमीन खरीदकर दो महीने में करोंड़ो कमाये वाड्रा साब ने कैसे कुछ असामान्‍य नहीं हुआ। और भी आरोप हैं विपक्षियों के खैर मैं सोच रहा हूं बेचारा मैंगो मैन क्‍या करेगा। क्‍या उसको भरोसा है कि जांच होगी, और अगर गलती से सरकारी कमिटी बैठा भी दी गयी तो क्‍या कहीं पहुंचने भी वाली है वो। लगता तो नहीं कुछ होगा।

अब डीएलएफ के साथ वाड्रा साब के व्‍यावसायिक रिश्‍ते तो मजबूत हैं वर्ना थोड़े ही कोई करोड़ों का कर्ज ऐसे ही दे देता है भला। आम आदमी की चुनी हुई हरियाणा सरकार ने कम कीमत में वाड्रा साब को जमीन दे दी, हरियाणा के सत्‍तासीन कांग्रेस सरकार के लोग खुश उन्‍होंने वाड्रा साब की मदद की, वाड्रा साब खुश की मोटा मुनाफा बना, डीएलएफ को भी फायदा हुआ ही सिर्फ आम आदमी ठगा रह गया। आमजन के टैक्‍स से चलनेवाली सरकारी मशीनरी दूसरों के राजनीतिक व व्‍यावसायिक हित साधते-साधते आमजन के हितों को ही भूल गयी। राजनीतिक गलियों में सही गलत के मायने बस मैं तक ही सिमट कर रह गए।

खैर, इस दौरान एक नाम उभरा जिसने इन सब अनियमितताओं के खिलाफ छोटा ही सही पर कदम उठाया। एक आइएएस ऑफीसर हैं हरियाणा के, नाम है अशोक खेमका सुना है ईमानदार हैं। अब कोई ईमानदारी का अवार्ड तो मिला नहीं उनको पर पिछले 20 बरसों में 40 बार स्‍थानांतरण से जूझ रहें है सो विश्‍वास किया जा सकता है ईमानदार होंगे। आइएएस साहब ने रॉबर्ट वाड्रा की जमीन खरीद मामले में कुछ अनुचित पाया और दे दिया जांच का आदेश, नतीजा फिर स्‍थानांतरण। फिर क्‍या होना था फिर से बचाव कर रही थी सरकार और रवीश जी एनडी टीवी वाले लगे थे प्राइम टाइम में गुत्‍थी सुलझाने में। हमेशा की तरह कुछ नतीजा निकलता नहीं दिखा, फिलहाल तो नींद आ रहीं है देखते हैं कल क्‍या होता है और अभी के लिए अशोक खेमका जी के जज्‍बे को सलाम